Tuesday, 3 July 2018

# Home # गुरु हमे मिल चुका हे

जय श्री राम

जय श्री राम

हनुमान जी के भगत जो अनुभव हुआ वह ज्ञान मेरे ही जेसे भगत के काम आ सके। इसी भावना सै यह ज्ञान आप के साथ बांटना चाहते हैं। मुझे हनुमान जी की भक्ति मेरे स्वार्थ से प्राप्त हुई है। बात है 12 साल पहले मेरा दर्द देख के मेरे जीजा जी ने। हनुमान चालीसा का पाठ करने को कहा। जब सब रस्ते बन्द हो जाते है। तब इन्सान को पथर भी दे दो ओर कहे दो यही हाथ में लेकर सुबह शाम प्रार्थना करते रहो। अवश्य ही तुम ठीक हो जाओगे। यकीन मानिए जेसे पयासै को लग रहा हो पानी का कुआं आस पास ही होगा यहीं शब्द मेरे शरीर मे ऊर्जा सी भर रहा हो। ऎसा होना लाजिमी था. आप का आप को चाहने वाला व्यक्ति कोई चीज या बात करे आप के लाभ की संभावना है वह व्यर्थ तो नहीं होगी ,यहीं आस के साथ में हनुमान चालीसा का पाठ अपने बिस्तर पर लैट लेटे करने लगा। मै स्नान नहीं कर सकता था। ना ही कपड़े बदलता था। हमनै जाना स्वार्थ सै लग्न हो जाती है,यही लग्न इतनी बड़ी के चमत्कार होने लगे हम जानते हैं। हमें जो मीला यह धन इस दूनीय मै खरीदा नहीं जा सकता है। हमारी माता जी हमें समझ जाती है। के बेटा तू डाक्टर इंजीनियर नहीँ बन पाया। हम माता जी  से कहते हैं. हम जो करने मे समर्थ हे। वह डीग्री कोई नहीं लाता। माता ने कहा बैटा तुम शादी कर लो। नहीं माता जी । माता जी नै कहाँ रोते हुए ,मेने पाला “ तुझै ‘यहीं इछां थी बहू पोता क्या देखना नसीब मे होगा। आज वक्त आया तो तु भगत बन गया। तेरी शादी का प्रस्ताव भी मुश्किल से मिले:गा ,ऊपर से कोई काम भी नहीं सीवा हनुमान के। हमने कहा मात जी, घर मे मेरा रिश्ता लेकर कोई आए आप ने इन्कार नहीं करना समझना के महैमान भगवान का रूप होते हैं। ये कर्म हे। हम अपने को अज्ञानी समझें दूसरे को विद्वान। जैसा भी हो वह भगवान की ईछा समझे अपना लाभ न देखे। मेरी शादी हो गई। एक पुत्र है। सादी के बाद घर में कलेस हर वक्त रहने लगा मेरे कारण नहीं अज्ञान के कारण हम दोनों में एक बात नहीं मिलती थी, में पत्नी को अपना भेद दे देता। पर उसने मुझे अपने बारे में कुछ नहीं बताया। मुझे आव्सकता भी नहीं हे। दोनों परिवार में बनती नहीं थी माता जी मुझे अपनी सचाई पेस करने को कहती। जब की वे अपनी सफाई उत्साह से देते मुझे आभास था यह बात सब को मालूम थी जो मन में ख्याल आते गए समय के हिसाब से पहले  या आने वाले वक्त के लिए पत्नी ओर माता जी को बता देता जिस से में तो संभल जाता उन्हें में संभल न पाता। कारण मुझे यह आभास था दो परिवार अपने को उच्च समझने के लिए सही गलत का चुनाव करेंगे गलती समय अज्ञानता की होगी इसी कारण एक दूसरे को दोस देंगे जिस वजह से पति पत्नी में दरार पड़ जाएगी। अपने अपने माता पिता को उच्च साबित करने के लिए ये छण : रिश्ते जोड़ने का था। एक हंकार मो घमंड के कारण परिवार दूर हो गए। कर्म की माने तो अपना अपना कर्म कोई नहीं निभा रहा था। मेरी मात जी ने चमत्कार का एहसास किया इस के बावजूत और उपेक्षा की पत्नी ने भी मेरा साथ दिया पर अपने माता पिता के मोह का गहरा असर था जिस वजह से मुझे अपना कर्म अपने लिए जीना पड़ा। बार बार हनुमान जी ज्ञान प्रदान करते थे। जो में समझ जाता अब पांचवी के छात्र को दसवीं का ज्ञान कैसे समझ आएगा इस वजह वक्त का इंतजार करता जब उन्हें एहसास होता पुत्र पति सास ससुर को आव्सकता होगी माता जी को पोते की जब सब अपना स्वार्थ भूल जायँगे। कभी कभी मान-सामान इतना एहमियत दे देता हे के अपने सिवा कुछ नहीं सही लगता भले ही दो दिल दूर हो जाए। इन्हे यह नहीं मालुम में पीस रहा था कर्म के कारण। जब की यह सब मेरा रास्ता फूलो सा बनाने में लगे थे।  इन्हे लगता था में साथ हूँ जब की में इन से बहुत दूर हो गया यह बात बता दी फिर भी। कोई फर्क नहीं पड़ा यही वह पल होता हे जब इंसान अपने दुखो को न्योता देता हे दोस भगवान को। मुझे सब, सवार्थी हँकारि दुनिया दारी पैसा जूठी इज्जत में लुप्त लगे अब मेरे पास वह पल था जब हनुमन की भगति के लिए। रिश्ते नाते अपने कर्तब्ये से मुक्त था। यह सच हे कर्म भी सवार्थ बन जाता हे में मुक्त होके भी सवार्थ का गुण पाउँगा। भले ही बुरा हो दुनिया की नजर में हर किसी ने मेरे कर्म के लिए कुछ ना कुछ योगदान दिया हे एक अच्छी बात सब में थी प्यार था अपनों से इसी कारण नफरत पैदा होती गई रिश्ते दूर होते गए ,एक दुःख और बना लिया सिर्फ मोह जाल में पड के फिर भी प्यार जित जाता हे, किसी ने बेटी किसी ने बेटे के लिए स्वार्थ जताया पत्नी ने भी प्यार निभाया भले ही माता पिता का सही इंसान प्यार करना तो जान पाया यही सुख समझ आता हे। मेरे दुःख ही कारण बने उच्च इंसान बनने में। निसवार्थ भगति बनी अनमोल ज्ञान पाने में। पैसा जान नहीं बचा सकता ,पैसा ज्ञान भी नहीं पा सकता दुनिया में नाम हो जाता हे दौलत सोहरत भी मिल जाती हे। सूंदर सरीर भी मिल जाता हे। सब मिल जाता हे मानो जादू की छड़ी हो। कुछ पल खुसी देती हे, ये दुनिया दारी की चीजे। इन से पेट भी भर जाता हे, फिर भी नई चीज की तलाश ख़त्म नहीं होती। ज्ञान सागर हे। जितना पियो  थोड़ा लगता हे प्यास बुझती ही  नहीं 

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